TN: तिरुनेलवेली में 5 साल में 1,097 दलित अत्याचार के मामले; हाईकोर्ट का तमिलनाडू सरकार को निर्देश —SC/ST मामलों में हत्या पीड़ितों के परिवारों को बढ़ी हुई पेंशन दें

2015 के संशोधित कानून के तहत मामले दर्ज नहीं किए जाते और पीड़ित परिवारों को 2016 के नियमों के तहत मिलने वाली पारिवारिक पेंशन से भी वंचित रखा जाता है। पिछले छह महीनों से पेंशन का भुगतान भी रोका गया था।
17 फरवरी, 2025 को हाईकोर्ट के मदुरै बेंच ने अपने फैसले में निर्देश दिया कि यदि लाभार्थी व्यक्तिगत रूप से सरकार के पास आवेदन करते हैं, तो सरकार को 8 सप्ताह के भीतर उचित कार्रवाई करनी होगी और हत्या पीड़ितों के परिवारों को निर्धारित संशोधित पारिवारिक पेंशन प्रदान करने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे।
तिरुनेलवेली –तमिलनाडु में जातिगत अत्याचारों के मामले में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, अकेले तिरुनेलवेली जिले में पिछले पांच वर्षों में दलितों और आदिवासियों के खिलाफ 1,097 जातिगत अत्याचार के मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें हिंसक हमले, यौन शोषण, हत्याएं और स्कूली बच्चों के साथ जातिगत भेदभाव शामिल हैं। ये आंकड़े राज्य सरकार की निष्क्रियता और अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लागू करने में विफलता को उजागर करते हैं।
अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत, तमिलनाडु सरकार हत्या पीड़ितों के परिवारों को ₹7,500 की मासिक पारिवारिक पेंशन प्रदान करने के लिए बाध्य है। हालांकि, दलित मुक्ति आंदोलन (DLM) ने पाया है कि यह योजना सभी जिलों में समान रूप से लागू नहीं की जा रही है, जिसके कारण कई प्रभावित परिवारों को वह वित्तीय सहायता नहीं मिल पा रही है, जिसके वे हकदार हैं।
दलित मुक्ति आंदोलन के प्रदेश अध्यक्ष एस. करुप्पैया के नेतृत्व में राज्य सरकार के पास एक याचिका प्रस्तुत की है, जिसमें अधिनियम के अनुसार पारिवारिक पेंशन योजना को समान रूप से लागू करने की मांग की गई है। आंदोलन ने कानूनी कार्रवाई भी की है और मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच में एक मामला (डब्ल्यू.पी. (एमडी) नंबर 4190 ऑफ 2025) दायर किया है, जिसमें प्रत्येक प्रभावित परिवार के लिए मासिक पारिवारिक पेंशन ₹17,300 तक बढ़ाने की मांग की गई है।
करुप्पैया ने बताया कि अत्याचार पीड़ितों को न्याय और मुआवजा दिलाने में सरकार लगातार विफल रही है। उन्होंने कहा कि 2015 के संशोधित कानून के तहत मामले दर्ज नहीं किए जाते और पीड़ित परिवारों को 2016 के नियमों के तहत मिलने वाली पारिवारिक पेंशन से भी वंचित रखा जाता है। पिछले छह महीनों से पेंशन का भुगतान भी रोका गया था।
आंदोलन के दबाव के बाद, आदि द्रविड़ कल्याण विभाग ने छह महीने की बकाया पेंशन के रूप में प्रति लाभार्थी 7,500 रुपये जारी किए। हालांकि, यह राशि नियमानुसार मिलने वाली 17,500 रुपये मासिक पेंशन से काफी कम है। इसके बाद, दलित मुक्ति आंदोलन ने मदुरै हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
17 फरवरी, 2025 को हाईकोर्ट मदुरै बेंच ने अपने फैसले में निर्देश दिया कि यदि सभी लाभार्थी व्यक्तिगत रूप से आवेदन करते हैं, तो सरकार को 8 सप्ताह के भीतर उचित कार्रवाई करनी होगी और हत्या पीड़ितों के परिवारों को निर्धारित संशोधित पारिवारिक पेंशन प्रदान करने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे।
करुप्पैया ने सभी पात्र लाभार्थियों से आग्रह किया कि वे चेन्नई स्थित आदि द्रविड़ कल्याण निदेशालय को अपने आवेदन जमा करें। उन्होंने कहा, “यह न्याय के लिए हमारे संघर्ष की बड़ी जीत है,” और दलित समुदाय के अधिकारों के लिए आंदोलन की प्रतिबद्धता दोहराई।
हाईकोर्ट का यह फैसला अत्याचार पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि राज्य में जातिगत हिंसा रोकने और कानूनों को सख्ती से लागू करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
सौजन्य: मूकनायक
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